स्नेह के बेजोड़ मायने
#स्नेह के बेजोड़ मायने__
"प्रेम" कहने के लिए कितना छोटा शब्द है ना.. पर आपकी मानसिकता और भावनाओं में कितना बड़ा परिवर्तन ला सकता है इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
अरे..! जरा रुकिए मैं उस प्रेम की बात नहीं कर रहा हूं जो आज के लोगों के लिए मनोरंजन का साधन है।
मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूं जो आपके अंतर्मन और भावनाओं पर सीधा प्रहार करता है।
हां वही प्रेम जो आंखों से होता हुआ स्पर्श तक पहुंचता है और जोड़ देता है अपने मन को सामने वाले व्यक्तित्व से..और ये ऐसा जोड़ है .. जिसमें जरा सा भी चटक पड़ने पर असहनीय घाव जैसी पीड़ा उत्पन्न होती है..
प्रेम को दूसरे शब्दों में जुनून ही कहा जा सकता है। ऐसा जुनून जो कुछ भी करने को आतुर हो बस सामने वाला उसे स्वच्छंद रूप से मिल जाए।
हां यह वही प्रेम है जो आपके मन को विचलित कर सकता है उस वक्त जब आप सामने वाले को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने साथ नहीं पाते.. प्रेम या स्नेह का स्वरूप ही ऐसा है यह सामने वाले व्यक्तित्व से लगाव के रूप में एक निश्चित समय के साथ उभरता है और साथ ही बीतते हुए पलों के साथ इतना पक्का हो जाता है कि मन अलगाव की कल्पना से भी डरता है। इस दुनिया में किसी की आदत हो जाना सबसे खतरनाक नशा है जिससे उबरने में ना जाने कितना वक्त लग जाता है ।
प्रेम में सारा भावनाओं का ही तो खेल है.. किसी से आप वास्तविक स्नेह करें.. और उसका आपके प्रति व्यवहार अचानक से बदल जाए तो उस पल-पल की पीड़ा का कोई तोड़ नहीं है, बस हर पल आप अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस करेंगे।
वास्तव में इसे महसूस उसी ने किया है जिसने किसी को अपने स्नेह और भावनाओं का वास्तविक समर्पण किया हो जिसके लिए उसने अपनी आदतों को बदला हो, खुद को उसके अनुसार परिवर्तित कर लिया हो फिर उसका सामने वाले से अपेक्षाएं होना लाजमी है।
पर आप जब कभी भी किसी से प्रेम करें या अपनी भावनाओं का वास्तविक समर्पण करें तो सामने वाले की प्राथमिकता बने ना कि उसका विकल्प बनें.. क्योंकि वैकल्पिक चीजों का उपयोग लोग समय के अनुसार ही करते हैं उसके पश्चात उनका मूल्य समाप्त हो जाता है।
यदि जीवन में आपके लिए कोई सच्चे मन से समर्पित है तो कदर कीजिए उसकी.. क्योंकि भावनाओं के आहत होने से ज्यादा पीड़ा इंसान को और किसी चीज से नहीं होती..
हां यह वही भावनाएं हैं जो दो अजनबी को भी अपना बना कर छोड़ती हैं उनमें स्नेह का बीज बोती हैं। जब स्नेह के निर्मित होने की प्रक्रिया में इतना वक्त लगता है तो कैसे कोई अपनी भावनाओं को और उससे जुड़ी अपनी आदतों को क्षण भर में बदल सकता है...
एक लम्बा अरसा लग जाता है व्यक्ति को अपनी भावनाएं और आदतों को बदलने में.. क्योंकि अंतर्मन में समाई हुई उससे जुड़ी एक क्षणिक घटना भी उसे भुलाने में अवरोध पैदा करती है।
बस यूं कहिए कि किसी से आदतों का लगना और फिर उनका भी बिखराव होना इतना कष्ट प्रद हो सकता है कि व्यक्ति अपने वास्तविक जीवन को केंद्रित कर पाने में अक्षम हो जाता है।
अपने प्रेम और स्नेह का पदार्पण वहीं पर कीजिए जहां पर आपको इस बात का पूर्ण विश्वास हो कि वह जीवन पर्यंत सिर्फ आपका ही रहेगा एक बार आदतों का लग जाना है और फिर उनका त्याग करना व्यक्ति की भावनाओं पर दरारें पैदा करता है जिससे व्यक्ति फिर कभी किसी के लिए ऐसा समर्पण देने से खुद को रोकने लगता है।
__ अखण्ड मिश्रा
मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित
(The author reserves all rights of writing.)
Gunjan Kamal
15-Nov-2022 05:02 PM
शानदार
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शताक्षी शर्मा
06-Nov-2022 10:25 PM
Very nice
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Teena yadav
06-Nov-2022 03:30 PM
OSm
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